धार्मिक आश्रमों पर कब्जे और व्यापार का काला सच: क्या है इसका पूरा पैटर्न?

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यहाँ के धार्मिक आश्रमों में से अधिकांश के साथ ज़मीन संबंधी विवाद जुड़े हैं और कोर्ट में केस चल रहे हैं। इनमें से बहुत से आश्रमों में एक विशेष ‘पैटर्न’ दिखाई देता है:

पहला चरण: सच्चे संन्यासी का आगमन

कहीं से एक सीधे-सादे भक्त या संन्यासी आते हैं। वे किसी खाली चबूतरे, वृक्ष की छांव या साधारण स्थान पर बैठकर चुपचाप प्रभु की भक्ति, भजन-कीर्तन और साधना करने लगते हैं। उन्हें दुनियादारी, चालाकियाँ और व्यापार करना नहीं आता; वे बस अपने प्रभु की भक्ति में लीन रहते हैं। उन्हें देखकर आसपास के लोगों में श्रद्धा जागती है और वे थोड़ी-बहुत सहायता करने लगते हैं। धीरे-धीरे उनके प्रति सहानुभूति और श्रद्धा रखने वालों का एक समूह बन जाता है।

दूसरा चरण: एक छोटे आश्रम का निर्माण

फिर कुछ ‘धर्म-जागरूक’ लोग आगे आते हैं और श्रद्धालुओं की मदद से उस संन्यासी बाबा के लिए ज़मीन, आवास या आश्रम का साधारण इंतज़ाम कर देते हैं। इसके बाद वहाँ धार्मिक आयोजन और श्रद्धालुओं का आना-जाना शुरू हो जाता है। आश्रम थोड़ा बड़ा बनने लगता है।  

तीसरा चरण: ‘विशेष‘ श्रद्धालु का प्रवेश

इसी बीच एक दिन कोई धनी या प्रभावशाली व्यक्ति ‘श्रद्धालु’ बनकर आता है। वह चुपचाप आम लोगों के बीच बैठकर संन्यासी के दर्शन करता है। धीरे-धीरे उसका आना-जाना बढ़ जाता है। वह लोगों के बीच प्रचार करने लगता है—“महाराज जी की कृपा से मेरे काम बन गए, संतान प्राप्ति हुई या व्यापार में लाभ हुआ। मैंने इनकी भक्ति का प्रभाव अपनी आँखों से देखा है। अब तो मेरी इतनी श्रद्धा है कि मैं पूरे परिवार को लाया हूँ और हर हफ्ते/महीने दर्शन करने आता हूँ।” इत्यादि।

चौथा चरण: प्रभाव और नियंत्रण की शुरुआत

बाबा जी के ‘आराम’ या ‘निर्विघ्न साधना’ के नाम पर उन्हें एक अलग कक्ष में ठहरा दिया जाता है।

फिर वह विशेष श्रद्धालु अचानक बिना किसी मांग के एक बड़ी रकम आश्रम को दान कर देता है। इसके बाद नियमित (regular) रूप से छोटे-बड़े दान आने लगते हैं। धीरे-धीरे आश्रम से जुड़े लोग उस व्यक्ति पर विश्वास करने लगते हैं।

बाबा जी अधिकांश समय अपने कक्ष में ही रहने लगते हैं। आम श्रद्धालुओं को कभी उनकी बढ़ती उम्र, कभी खराब स्वास्थ्य तो कभी मौन-साधना का हवाला दिया जाता है। धीरे-धीरे बाबा का आम लोगों से मिलना-जुलना कम हो जाता है।

अंतिम चरण: वास्तविक शक्ति का हस्तांतरण

अंत में, एक दिन वह विशेष श्रद्धालु बड़ी श्रद्धा के साथ गाड़ी लेकर आता है—बाबा को गंगा-स्नान, इलाज या अपने घर में आशीर्वाद दिलाने के बहाने ले जाने के लिए। वर्षों के परिचय और आश्रम पर किए गए उपकारों के कारण कोई उस पर संदेह नहीं करता। वह बाबा को ले जाता है, जिसके बाद वे फिर कभी किसी को दिखाई नहीं देते।

कई मामलों में बाबा आश्रम में ही रहते हैं, लेकिन वे महज़ एक प्रदर्शन की वस्तु बनकर रह जाते हैं। किसी भी निर्णय में उनकी भागीदारी नहीं होती और न ही उन्हें पूरी जानकारी दी जाती है, पर आश्रम उन्हीं के नाम पर चलता रहता है। वास्तविक शक्ति और नियंत्रण उस तथाकथित ‘भक्त’ या ‘भक्तों’ के पास आ चुका होता है।

यह पैटर्न आज से लगभग 4-5 वर्ष पहले मुझे वृंदावन के एक आश्रम के मुख्य पुजारी जी ने बताया था। वहाँ उपस्थित एक वरिष्ठ अधिकारी और अन्य लोगों ने भी इस बात का समर्थन किया था।

यद्यपि मुझे इस विषय में कोई व्यक्तिगत प्रत्यक्ष जानकारी नहीं है, लेकिन निजी बातचीत में लोग अक्सर ऐसी बातें कहते हैं। यदि आपमें से किसी को इस संबंध में कोई जानकारी हो, तो अवश्य साझा करें।

मेरा व्यक्तिगत रूप से मानना है कि धर्म एक बहुत श्रेष्ठ विचार है। लेकिन जब कोई श्रेष्ठ विचार भी धन और बल का साधन बन जाए, तो वह अत्यंत दुष्परिणाम देने वाला हो जाता है।

प्रेमानंद जी के युवा शिष्य रसिकदास जी की दुखद मृत्यु या स्वयं प्रेमानंद जी के विषय में मुझे पूर्ण जानकारी नहीं है, इसलिए केवल अनुमान के आधार पर कोई राय बनाना उचित नहीं होगा। किंतु, सीधे-सादे भगवत-भक्तों के नाम पर व्यापार किए जाने के उदाहरण समाज में विरल (दुर्लभ) नहीं हैं।

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